वैचारिकी : राजनीतिक टिप्पणी
कबीर का यह दोहा तृष्णा की व्याधि पर था – “माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर, आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।” पर आज इसे कांग्रेस की वैचारिक यात्रा पर आजमाया जाए तो पंक्तियाँ अजीब तरह सटीक बैठती हैं। सत्ता (माया) कब की छिन चुकी, शरीर यानी संगठन जर्जर हो चला, पर मन यानी वैचारिक स्पष्टता का सवाल अब भी वहीं अटका है जहाँ दशकों पहले था।
कांग्रेस की मुश्किल यह नहीं कि उसके पास विचार नहीं। मुश्किल यह है कि उसके पास एक साथ कई विचार हैं, और वे आपस में लड़ते रहते हैं। नेहरूवादी समाजवाद की विरासत, उदारीकरण के दौर की बाज़ार-हितैषी नीतियाँ, अस्मिता-आधारित गठबंधन की राजनीति, और अब सामाजिक न्याय व जाति-गणना की नई भाषा – ये सब एक ही पार्टी के भीतर बिना किसी संश्लेषण के साथ-साथ चलते हैं। हर चुनाव में जो स्वर सबसे ऊँचा बोलता है, वही उस समय की “विचारधारा” बन जाता है, अगले चुनाव में कोई और।
यह मृगतृष्णा की तरह इसलिए है क्योंकि दूर से यह हमेशा एक सुसंगत वैचारिक ढाँचे जैसी दिखती है – “इडिया की सोच”, “गांधी-नेहरू विरासत”, “समावेशी भारत” – पर जैसे ही निकट जाओ, पानी की तरह यह छिटक जाती है। न कोई ठोस आर्थिक दर्शन बचता है, न सुरक्षा और विदेश नीति पर कोई एक स्वर, न सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रश्न पर कोई साफ पक्ष। विरोध की राजनीति ने पार्टी को यह सुविधा दी कि वह हर मुद्दे पर सत्तापक्ष के विरुद्ध खड़ी होकर अपनी पहचान गढ़े, पर विरोध कोई विचारधारा नहीं होती – वह केवल प्रतिक्रिया होती है।
इसकी तुलना अक्सर भाजपा-आरएसएस पारिस्थितिकी तंत्र से की जाती है, जिसकी आलोचना चाहे जितनी हो, उसके पास दशकों से एक सुसंगत वैचारिक ढाँचा रहा है – सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, और एक निश्चित आर्थिक-राष्ट्रीय सुरक्षा दृष्टिकोण – जिसके इर्द-गिर्द कार्यकर्ता और मतदाता दोनों लामबंद होते हैं।
कांग्रेस के पास वैसा कोई केंद्रीय स्तंभ नहीं बचा; 2014 के बाद के हर चुनावी हार के बाद पार्टी ने रणनीति बदली, नेतृत्व नहीं बदला, और विचारधारा पर बहस को टाल दिया।तृष्णा यह भी है कि नेतृत्व मानता है सत्ता वापस मिल जाए तो वैचारिक स्पष्टता अपने आप आ जाएगी – पर इतिहास इसका उल्टा दिखाता है। स्पष्टता पहले आती है, सत्ता उसके बाद। जब तक कांग्रेस यह तय नहीं करती कि वह आर्थिक रूप से किस दिशा में खड़ी है, सामाजिक न्याय और उदारवाद के बीच संतुलन कैसे बिठाएगी, और भारत की सांस्कृतिक पहचान पर उसका अपना नैरेटिव क्या है – तब तक “मन” नहीं मरेगा, बल्कि मन भटकता ही रहेगा।