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माया मरी ना मन मरा : कांग्रेस (congress) की मृगतृष्णा
वैचारिकी : राजनीतिक टिप्पणी कबीर का यह दोहा तृष्णा की व्याधि पर था – “माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर, आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर।” पर आज इसे कांग्रेस की वैचारिक यात्रा पर आजमाया जाए तो पंक्तियाँ अजीब तरह सटीक बैठती हैं। सत्ता (माया) कब की छिन चुकी, शरीर यानी…