वैचारिकी : राजनितिक समीक्षा
राजन, आप धर्मराज कहलाना चाहते हैं, पर जुए की लत आपको भी लगी दिखती है। द्वापर का युधिष्ठिर एक बार में सब कुछ हार कर वन-वन भटका था , आज वही दृश्य फिर रचा जा रहा है, बस पासे अलग हैं। सवर्ण और दलित के बीच जो विभाजन-रेखा आपकी नीतियों ने और गहरी कर दी है, वह जुआ नहीं तो क्या है?
आपने अत्याचार निवारण अधिनियम को और कठोर कर दिया, पर यह भूल गए कि कानून जब भय का हथियार बन जाए, तो न्याय स्वयं आरोपी बन जाता है। न्यायालयों ने बार-बार कहा है, कहीं झूठे मुकदमे रंजिश के लिए, कहीं संपत्ति के लिए, कहीं प्रथम सूचना रिपोर्ट पर मिलने वाली सहायता राशि के लालच में। जहां FIR दर्ज होते ही धन मिलने लगे, वहां न्याय नहीं, व्यापार पनपता है, और यह व्यापार आज कुछ दलालों का धंधा बन चुका है।
आरक्षण की मीनार भी छद्म खड़ी है, राजन। इसकी छाया में जाटव, चमार, पासी, मीणा जैसी कुछ ही जातियां बैठी हैं, शेष आज भी द्वार के बाहर हैं। यह असमानता के भीतर छिपी असमानता है, जिसे आपने कभी सुनने की चेष्टा नहीं की।
सवर्ण मतदाता, जो कभी आपका सबसे स्थिर पासा था, आज हाथ से फिसलता दिख रहा है। द्वापर में तो कृष्ण थे, आज कोई कृष्ण आपकी सहायता के लिए नहीं है।
परामर्श है कि पासे अब रख दीजिए, राजन, इससे पहले कि वनवास अनिवार्य हो जाए।